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दिनांक: 9 फरवरी 2026

9 फरवरी 2026 की रात एक आम सफर अचानक दर्दनाक हादसे में बदल गया। मैं वसई से ठाणे की ओर जा रहा था। सड़क पर सामान्य ट्रैफिक था और अधिकतर भारी वाहन, खासकर ट्रक, अपनी रफ्तार से चल रहे थे। तभी एक ट्रक चालक ने ओवरटेक करने के प्रयास में बेहद लापरवाही दिखाई, जिसका परिणाम एक गंभीर सड़क दुर्घटना के रूप में सामने आया।

प्रत्यक्षदर्शी के अनुसार, ट्रक ने बिना पर्याप्त जगह और संकेत दिए अचानक कट मार दिया। इससे मेरी कार ट्रक के बॉडी हिस्से में बुरी तरह फंस गई। टक्कर इतनी तेज थी कि कार का पूरा साइड हिस्सा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। दरवाजे अंदर की ओर दब गए, शीशे टूट गए और वाहन का संतुलन बिगड़ गया। कुछ क्षणों के लिए ऐसा लगा मानो सब कुछ थम गया हो।

गनीमत रही कि वाहन में सवार परिवार के सभी सदस्य सुरक्षित हैं। हालांकि कार को भारी नुकसान हुआ है, लेकिन किसी की जान नहीं गई—यह सबसे बड़ी राहत की बात है।

दुर्घटना के तुरंत बाद आपातकालीन सहायता के लिए 112 हेल्पलाइन नंबर पर दो बार कॉल किया गया। लेकिन दुर्भाग्यवश, मौके पर न तो कोई पुलिस सहायता पहुंची और न ही कोई अन्य आपात सेवा उपलब्ध हुई। रात के अंधेरे में हमें अपनी व्यवस्था खुद ही करनी पड़ी।

सबसे अधिक निराशा इस बात की रही कि जिस सिस्टम पर आम नागरिक भरोसा करता है, वही संकट की घड़ी में नजर नहीं आया। करदाताओं के पैसे से चलने वाली व्यवस्था से कम से कम इतनी अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि दुर्घटना की सूचना मिलने पर तुरंत मदद पहुंचे। लेकिन जब बाद में संपर्क किया गया, तो जवाब मिला कि “पुलिस स्टेशन आकर शिकायत दर्ज कराइए।”

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब हादसा सड़क पर हुआ है, तो क्या प्राथमिक जिम्मेदारी मौके पर पहुंचकर हालात संभालने की नहीं होनी चाहिए?

यह घटना केवल एक सड़क दुर्घटना नहीं है, बल्कि व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करती है। यदि इस हादसे में किसी की जान चली जाती, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेता?

आशा है कि संबंधित ट्रक चालक के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए जाएंगे। साथ ही यह भी उम्मीद है कि आपातकालीन सेवाएं अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से लें, ताकि किसी और परिवार को ऐसी स्थिति का सामना न करना पड़े।

इस हादसे ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि सड़क सुरक्षा और आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र को और मजबूत करने की कितनी आवश्यकता है।

दुर्घटना के बाद मैंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर (X) पर भी ट्रक का नंबर सार्वजनिक रूप से साझा किया, ताकि संबंधित विभाग तुरंत संज्ञान ले और कार्रवाई करे। लेकिन वहां भी कोई जवाब नहीं मिला। न किसी अधिकारी ने संपर्क किया, न ही किसी तरह की पहल दिखाई गई।

यह स्थिति केवल एक व्यक्ति की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है। जब एक नागरिक दुर्घटना के बाद हेल्पलाइन पर कॉल करता है, सोशल मीडिया पर सूचना देता है, फिर भी उसे कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती, तो यह चिंता का विषय है।

आज यह घटना मेरे साथ हुई है, लेकिन कल यही किसी और के साथ भी हो सकती है। सवाल यह है कि आखिर आम नागरिक संकट की घड़ी में किस पर भरोसा करे?

जरूरत इस बात की है कि जिम्मेदार विभाग समय रहते कार्रवाई करें, ताकि लापरवाह वाहन चालकों पर रोक लगे और आम लोगों की जान सुरक्षित रह सके। सड़क पर चलने वाला हर व्यक्ति सुरक्षित घर पहुंचे—यह केवल उसकी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की जिम्मेदारी है।

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